Monday, October 3, 2022
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धर्म और संस्कृति की भूमिका

धर्म एवं संस्कृति पर प्राय: होने वाली बहस में यह भुला दिया जाता है कि भारत की पहचान सदा से धर्म एवं संस्कृति ही रही है। ये दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। जहां धर्म संस्कृति का आधार है, वहीं संस्कृति धर्म की संवाहिका है। दोनों ही अपने-अपने परिप्रेक्ष्य में राष्ट्र के निर्माण एवं राष्ट्रीयता के संरक्षण में सहायक सिद्ध होते हैं। जहां धर्म अपनी स्वाभाविकता के साथ सामाजिक परिवेश का आधार बनता है, वहीं संस्कृति सामाजिक मूल्यों का स्थायी निर्माण करती है। कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि धर्म का सूत्र मानव के सर्वांगीण विकास को सुनिश्चित करता है तो वहीं संस्कृति मानवीय संवेदनाओं को सामाजिक सरोकार से जोड़ती है। इस तरह धर्म कालांतर में संस्कृति का रक्षण करता है और संस्कृति धर्म के आधार का उन्नयन करती है।
जहां धर्म हमारे सर्वस्व का प्रतीक रहा है तो वहीं संस्कृति हमारी स्वाभाविक जीवनशैली की वाहिका रही है। दोनों ने ही भारतीय मूल्यों को जीवंत रखा है और संसार में इसी कारण से भारत का मान-सम्मान रहा है। प्राचीन समय में धर्म एक नागरिक के जीवन के उद्देश्यों का आधार था। धर्म मात्र प्रतीक नहीं होकर समग्र चेतना का स्तंभ था। परिणामस्वरूप भारत की सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक व्यवस्था मजबूत थी। इस तरह भारतीय का जीवन शांत एवं सुखी था। तब संस्कृति, भारतीयता को परिभाषित करती थी और भारत की सारी व्यवस्थाएं संस्कृति पर आधारित थीं। संस्कृति का सौरभ ही हमारे राष्ट्र का सौरभ था। इस तरह से हमारी पारिवारिक एवं सामयिक पृष्ठभूमि निरंतर विकसित होती गई। हमारे वैचारिक दृष्टिकोण का ताना-बाना हमारी संस्कृति पर ही आधारित था और हमारा संपूर्ण जीवन उन्नति के चरम पर पहुंचता रहा। धीरे-धीरे हमारी धार्मिक मान्यताएं और स्थिर होती गईं और संस्कृति का क्रमिक विकास होता गया। कहना गलत नहीं होगा कि धर्म और संस्कृति ने मिलकर हमारी भारतीयता को विकसित किया। यह भारतीय धर्म की विशेषता रही है कि वह जटिलताओं में जकड़ा न रहा और सतत चिंतन की अवधारणा को विकसित होने में सहायक सिद्ध हुआ, जिसके कारण अनेक भारतीय धर्मों का उदय हुआ। बौद्ध, जैन एवं बाद में सिख धर्म ने अपनी चिंतनशैली को विकसित किया, परंतु मूल में सनातन धर्म ही रहा। सनातन धर्म का आशय हिंदू धर्म मात्र से नहीं, बल्कि बौद्ध, जैन, सिख धर्म से भी है। भगवान बुद्ध एवं महावीर ने सनातन धर्म के संस्कार में ही जन्म लिया और इस तरह उन्होंने अपने चिंतन को स्वतंत्र स्वरूप प्रदान कर नई र्धािमक व्यवस्था का निर्माण किया। भगवान बुद्ध ने सनातन धर्म के अनेक पहलुओं में परिपक्वता प्रदान की और उनमें व्याप्त कुंठित व्यवहारों और विचारों से मुक्त होकर भारतीय धर्म को मजबूत किया। उन्होंने धर्म की स्वतंत्र व्याख्या अवश्य की, पर मूल में उसके सांस्कृतिक चिंतन को सर्वोच्च स्थान दिया। भारतीय मानसिकता को धर्म की वास्तविकता से संयुक्त किया और हर वर्ग को धर्म से होने वाले लाभ को सुनिश्चित किया। भारतीय मूल दर्शन सनातन धर्म को दर्शाते हैं और इस तरह हिंदू, बौद्ध, जैन एवं सिख धर्म उस व्यवस्था को मजबूत करते हैं। यद्यपि इन धर्मों को अपने-अपने परिवेश में विकसित होने में धार्मिक स्वतंत्रता अवश्य रही, परंतु सांस्कृतिक एकता बनी रही। भारतीय संस्कृति के समग्र विकास में भारत के सभी धर्मों ने अपना-अपना योगदान दिया। इस प्रकार भारत की सामाजिक व्यवस्था धार्मिक एवं सांस्कृतिक होते हुए भी वैज्ञानिक विचारों को हमेशा आत्मसात करती रही। विकास की नई संभावनाओं को संबल प्रदान करती रही। धर्म के मार्गदर्शन में ही भारतीय चिंतन व्यवस्था पनपी और कालांतर में विश्व की चिंतन व्यवस्थाओं और मान्यताओं को प्रभावित करती रही। परिणामस्वरूप भारत धर्म गुरु के रूप में स्थापित हुआ और इस तरह भारत का संबंध विश्व में प्रभावी रूप से कायम हुआ। भारत में धार्मिक दृष्टिकोण तो प्रचलित हुआ ही, साथ ही राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक संबंधों को भी पनपने और विकसित होने में सफलता मिली। विश्व के अनेक देशों के साथ कई एशियाई देशों से विशेष रूप से हमारा संबंध प्रगाढ़ बना और भारतीय धर्म एवं संस्कृति का भी सम्यक विकास हुआ। आज उन देशों में भारतीय धर्म एवं संस्कृति की विरासत पूरी तरह संरक्षित है, जो इस बात को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि भारतीय धर्म एवं संस्कृति किसी भी देश अथवा वर्ग की मान्यताओं को समाप्त नहीं करती, बल्कि उनका परिमार्जन करती है। आज हम पाते हैं कि भारतीय चिंतन पर आधारिक अनेक शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक संस्थाएं दुनिया के विभिन्न हिस्सों में स्थापित होकर काम कर रही हैं। वे हमारी विरासत का संरक्षण ही कर रही हैं। भाषा के मामले में भी देखें तो भारतीय भाषाओं ने विश्व की भाषाओं को प्रभावित किया और कई विदेशी भाषाओं के निर्माण में भारतीय भाषाओं ने योगदान दिया। एशियाई देशों की अधिकतर भाषाएं संस्कृत, पालि एवं प्राकृत पर आधारित हैं। इस तरह इन भाषाओं से विकसित विदेशी भाषाओं से भारतीय दर्शन एवं संस्कृति का सहज ही ज्ञान परिलक्षित होता है। भारतीय भाषाविदों, धार्मिक गुुरुओं एवं संस्कृति को पोषित करने वाले व्यक्तियों ने विश्व में अपनी पहचान बनाकर भारत की गरिमा को हमेशा गौरव प्रदान किया। अनेक लोग भारतीय धर्म एवं संस्कृति के माध्यम से आज भी निरंतर सक्रिय हैं। आवश्यकता इसकी है कि भारतीय धर्म एवं संस्कृति के विभिन्न आयामों को आधुनिक परिवेश में परिभाषित किया जाए और इन क्षेत्रों में काम कर रहे लोगों को सरकार द्वारा प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इससे न केवल भारत का सांस्कृतिक संबंध दुनिया से मजबूत होगा, बल्कि आर्थिक एवं राजनयिक संबंध भी प्रगाढ़ होंगे।

-आचार्य अरविंद आलोक
( लेखक बौद्ध अकादमी के निदेशक हैं )

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